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वारुणी पैदल पदयात्रा का अश्वमेघ यज्ञ जैसा पुण्य लाभ मिलता है।

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जिद्दी कलम संवाददाता
उत्तरकाशी–प्राकृतिक सुंदरता के बीचों–बीच पंचकोसी वारुणी नाम से हर साल होने वाली इस यात्रा का बड़ा धार्मिक महत्व माना जाता है। कहा जाता है कि इस यात्रा को पूर्ण करने वाले व्यक्ति को 33 करोड़ देवी देवताओं की पूजा-अर्चना का पुण्य लाभ मिलता है। यह भी मान्यता है कि वारुणी पैदल यात्रा करनें ईष्ट मित्रों सगे संबंधियों के साथ शामिल होंनें मात्र से अश्वमेध यज्ञ कराने जैसा लाभ मिलता है।

लगभग 15 से 18किमी लंबी इस पदयात्रा की शुरुआत कर श्रद्धालु बड़ेथी गंगा जी के संगम स्थित वरुणेश्वर मंदिर से गंगाजल भर बसूंगागांव के अखंडेश्वर, साल्डगांव के जगरनाथ व अष्टभुजा दुर्गा मंदिर,में जलाभिषेक कर निरंतर आगे बढ़ते हुए ज्ञाणजागांव के ज्ञानेश्वर मंदिर व्यास कुंड, से वरुणावत शीर्ष पर शिखेरश्वर, विमलेश्वर महादेव, उतरते हुए काशी के विश्वनाथ मंदिर दर्शन और उत्तरकाशी, जोशियाड़ा, कुटैटी देवी का मनोरम दृश्य देखते हुए उतराई में उतरते है।

जहां से प्राकृतिक खूबसूरती चीड़ बांझ–बुरांश के साथ अन्य बेल पत्रों के साथ बनते बनती है। इस बीच संग्राली में कंडार देवता, पाटा में नरर्वेदश्वर मंदिर के दर्शन के बाद हजारों लाखों की संख्या में श्रद्धालु गंगोरी पहुंचते हैं। असी गंगा और भागीरथी में स्नान के बाद विश्वनाथ मंदिर में जलाभिषेक करते हैं। और जलाभिषेक के साथ यात्रा का पुण्य प्राप्त कर घर लौटते हैं। दूर–दूर से श्रद्धालू आए रहते हैं। स्थानीय लोगो को रोजगार से लेकर दान पुण्य करनें का अवसर मिलता है। कई संस्थाएं, संगठन, गांव, क्षेत्रवासी, जनप्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता भंडारा भी पैदल यात्रियों के लिए आयोजित करते हैं।

आज ब्रह्ममुहूर्त से ही बड़े बड़े समूह में श्रद्धालुओं के जत्थे वारुणी यात्रा पर निकलने शुरू हो गए थे। करीब 15 से 18 किमी लंबी इस पदयात्रा के लिए इस बार हजारों लाखों श्रद्धालुओं नें वरुण पर्वत वारूणी यात्रा की आंधी तूफान की दृष्टि से यह यात्रा आसान भरकम दोनों ही है। पाश्चात्य सभ्यता संस्कृति के अंधेपन में हिंदू अपनें धर्म, संस्कृति, परंपरा को भूलता जा रहा है। या यूं कहें कि विसरता जा रहा है। हिंदू संस्कृति परंपरा थौले–मेलों को संहेजने की आवश्यकता है। इसके लिए संस्कृति तीर्थटन संबंधित विभागों को आनें वाली पीढ़ियों को जागरुक करनें की दिशा में जरूरी कदम उठाया जाना चाहिए ताकि भूलती विसरती संस्कृति परंपरा को आनें वाले भविष्य के लिए सहेजा जा सके

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Author: ziddikalam

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