जिद्दी कलम | उत्तरकाशी
विकासखंड डुंडा की ग्राम सभा खटूखाल में बाघ का आतंक लगातार बढ़ता जा रहा है। सोमवार शाम करीब 7 बजे सड़क पर बाइक से जा रहे दो युवकों पर अचानक बाघ ने हमला करने का प्रयास किया। गनीमत रही कि उसी समय पीछे से एक मैक्स वाहन आ गया, जिसके कारण बाघ वहां से हट गया और दोनों युवक बाल-बाल बच गए।
अचानक सामने आए बाघ से घबराकर युवकों की बाइक अनियंत्रित होकर सड़क पर फिसल गई। हादसे में एक युवक को चोट भी आई है। घटना के बाद से पूरे खटूखाल गांव में भय और दहशत का माहौल बना हुआ है।
पहले भी लड़की पर हो चुका है जानलेवा हमला
ग्रामीणों के मुताबिक, इससे पहले भी इसी गांव में बाघ एक लड़की पर जानलेवा हमला कर चुका है। लगातार सामने आ रही घटनाओं को देखते हुए वन विभाग द्वारा क्षेत्र में दो पिंजरे लगाए गए हैं, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था उनकी सुरक्षा के लिए पर्याप्त नहीं है।
विकासखंड डुंडा में लगभग दो माह के भीतर बाघ और भालू से जुड़ी यह चौथी घटना बताई जा रही है। ऐसे में ग्रामीणों के सामने सबसे बड़ा सवाल उनकी सुरक्षा का है।
कड़ा सवाल: आखिर किस बड़ी अनहोनी का इंतजार?
जब आबादी वाले क्षेत्र और सड़क पर बाघ खुलेआम घूम रहा हो और लोगों की जान पर खतरा मंडरा रहा हो, तो प्रशासन और वन विभाग की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।
सिर्फ पिंजरे लगाने से जिम्मेदारी पूरी नहीं हो जाती।
ग्रामीणों की जान की सुरक्षा कौन करेगा?
ग्रामीणों का आरोप है कि लगातार घटनाओं के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी इस गंभीर समस्या को लेकर अपेक्षित तत्परता नहीं दिखा रहे हैं। सवाल यह भी है कि क्या प्रशासन किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रहा है?
जनता दहशत में है और जिम्मेदार तंत्र आखिर कहां है?
ग्रामीणों को अब भाषण नहीं, ठोस कार्रवाई और सुरक्षा चाहिए। वन विभाग को तत्काल क्षेत्र में गश्त बढ़ाने, बाघ की गतिविधियों पर प्रभावी निगरानी करने और ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने चाहिए।
आज दो युवक बच गए, कल कोई और बच पाएगा—यह जरूरी नहीं।
अगर समय रहते प्रशासन और वन विभाग नहीं जागा, तो किसी बड़ी घटना की जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी?
ग्रामीणों की जिंदगी किसी पिंजरे या कागजी कार्रवाई से सुरक्षित नहीं होगी।
अब जरूरत है तत्काल कार्रवाई की।
खटूखाल पूछ रहा है—
“आखिर हमारी जान की कीमत कब समझेगा प्रशासन?”






