जिद्दी कलम
उत्तरकाशी
उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में मनरेगा/ V-B-G RAM G कार्यों में डिजिटल हाजिरी को लेकर प्रधान संगठनों की ओर से ऑफलाइन हाजिरी की मांग उठ रही है। तर्क यह है कि अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में मोबाइल नेटवर्क की समस्या है, जिसके कारण श्रमिकों की डिजिटल हाजिरी दर्ज करने में दिक्कत आती है। यह समस्या वास्तविक हो सकती है और दूरस्थ पहाड़ी गांवों की जमीनी परिस्थितियों को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।
लेकिन यहीं से एक बड़ा सवाल खड़ा होता है—क्या नेटवर्क की कमी का समाधान डिजिटल व्यवस्था को पीछे ले जाना है, या पहाड़ों तक मजबूत मोबाइल नेटवर्क पहुंचाना?
अगर किसी गांव में नेटवर्क नहीं है तो यह केवल मनरेगा की हाजिरी का संकट नहीं है। उसी गांव में किसी बीमार व्यक्ति को अस्पताल से संपर्क करने में परेशानी होती है, आपदा के समय सूचना पहुंचाना मुश्किल होता है, विद्यार्थियों की ऑनलाइन पढ़ाई प्रभावित होती है, युवाओं के रोजगार और डिजिटल सेवाओं तक पहुंच सीमित होती है और सरकारी योजनाओं की ऑनलाइन सुविधाएं भी ग्रामीणों से दूर हो जाती हैं।
इसलिए सवाल केवल ऑफलाइन बनाम ऑनलाइन हाजिरी का नहीं है। सवाल यह है कि हम पहाड़ के गांवों को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं?
सवाल बड़ा अगर नेटवर्क नहीं है तो नेटवर्क की मांग क्यों नहीं?
प्रधान गांव की सबसे निचली और सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक इकाई का प्रतिनिधि है। ग्राम प्रधान यदि अपने गांव में नेटवर्क की समस्या को लेकर सरकार और प्रशासन के सामने मजबूती से आवाज उठाए, मोबाइल टावरों की मांग करे, नेटवर्क विस्तार के लिए सामूहिक प्रस्ताव भेजे और संबंधित विभागों पर दबाव बनाए, तो इसका लाभ केवल मनरेगा मजदूरों को नहीं बल्कि पूरे गांव को मिलेगा।
आज मनरेगा की हाजिरी के लिए नेटवर्क चाहिए, कल शिक्षा के लिए चाहिए, परसों स्वास्थ्य सेवाओं के लिए चाहिए और आने वाले समय में लगभग हर सरकारी सेवा के लिए चाहिए।
फिर क्यों न मांग ऐसी हो जो आने वाले वर्षों के लिए गांव की तस्वीर बदल दे?
आज व्यवस्था को पीछे नहीं, गांव को आगे ले जाने की जरूरत है।
डिजिटल व्यवस्था में कमियां हैं तो उन्हें दूर किया जाना चाहिए। पहाड़ी क्षेत्रों के लिए तकनीकी और व्यावहारिक व्यवस्था विकसित की जा सकती है। जहां नेटवर्क नहीं है, वहां वैकल्पिक तकनीकी समाधान, ऑफलाइन डेटा कैप्चर और नेटवर्क उपलब्ध होते ही सत्यापन जैसी व्यवस्थाओं पर विचार हो सकता है।
लेकिन केवल इस आधार पर कि पहाड़ में नेटवर्क नहीं है, डिजिटल व्यवस्था को ही समाप्त करने की मांग करना कहीं न कहीं उस मूल समस्या को नजरअंदाज करना है, जिसकी वजह से पहाड़ आज भी डिजिटल सुविधाओं से पिछड़ा हुआ है।
प्रधान संगठन यदि इस मुद्दे को व्यापक रूप से उठाएं और कहें कि—
“मनरेगा/ V-B-G RAM G में डिजिटल हाजिरी लागू करनी है तो पहले हर ग्राम पंचायत में पर्याप्त मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध कराया जाए।”
तो यह मांग सिर्फ मनरेगा/ V-B-G RAM G तक सीमित नहीं रहेगी। यह पहाड़ के हर गांव के भविष्य से जुड़ी मांग बन जाएगी।मनरेगा/ V-B-G RAM G असली लड़ाई हाजिरी की नहीं, पहाड़ के भविष्य की है
ऑफलाइन हाजिरी से आज की परेशानी शायद कम हो जाए, लेकिन नेटवर्क की समस्या जस की तस रहेगी। दूसरी ओर यदि नेटवर्क के लिए संगठित प्रयास होते हैं तो उसका लाभ वर्षों तक गांव की आने वाली पीढ़ियों को मिलेगा।
इसलिए सवाल प्रधान संगठनों से भी है और सरकार से भी कि
क्या हम पहाड़ की समस्याओं का समाधान व्यवस्था को पीछे ले जाकर करेंगे या पहाड़ को आधुनिक सुविधाओं से जोड़कर?
मनरेगा/ V-B-G RAM G की हाजिरी एक प्रशासनिक प्रक्रिया है, लेकिन मोबाइल नेटवर्क आज के दौर में गांव की बुनियादी जरूरत बन चुका है।
जरूरत ऐसी मांग की है जो सिर्फ आज की परेशानी का रास्ता न निकाले, बल्कि आने वाले कल के पहाड़ की तस्वीर बदले।
क्यों न प्रधान संगठन ऑफलाइन हाजिरी की मांग के साथ-साथ हर ग्राम पंचायत में बेहतर मोबाइल नेटवर्क की गारंटी की मांग भी उठाएं?
क्योंकि“हाजिरी ऑफलाइन हो जाएगी, लेकिन पहाड़ ऑनलाइन कब होगा?”





